||श्री गणेशाय नमः|| ||श्री सरस्वतेय नमः|| ||श्री सद्गुरुभ्यो नमः||
नामधारक शिष्य देखा | विनवी सिद्धासी कवतुका |
प्रश्न करी अति विशेखा | एक चित्ते परियेसा ||१||
जय जया योगीश्वरा | सिद्ध्मुर्ती ज्ञानसागरा |
पुढील चरित्र विस्तार | ज्ञान होय आम्हासी ||२||
उदर व्यथेच्या ब्राम्हणासी | प्रसन्न झाले कृपेसी |
पुढे कथा वर्तली कैसी | विस्तारावे आम्हाप्रती ||३||
ऐकोनी शिष्याचे वाचन | संतोष करी सिद्ध आपण |
श्रीसद्गुरूचरित्र चरित्र कामधेनु जाण | सांगता जाहला विस्तारे ||४||
ऐक शिष्य शिखामणी | भिक्षा केली ज्याचे भुवनी |
तयावरी संतोषोनी | प्रसन्न जाहले परियेसा ||५||
श्रीसद्गुरू भक्तीचा प्रकारु | पूर्ण जाणे तो द्विजवरू |
पूजा केली विचित्रु | म्हणोनी आनंद परियेसा ||६||
तया सांयदेव द्विजासी | श्रीसद्गुरू बोलती संतोषी |
भक्त हो रे वंशोवंशी | माझी प्रीती तुजवरी ||७||
ऐकोणी श्रीसद्गुरुंचे वचन | सांदेव विप्र करी नमन |
माथा ठेवुनी चरणी | न्यासिता झाला पुनःपुन्हा ||8||
जय जया जगद्गुरु | त्रयामुर्तीचा अवतारू |
अविद्यामाया दिससी नरू | वेदां अगोचर तुझी महिमा ||9||
विश्व व्यापक तूची होशी | ब्रम्हा विष्णू व्योमकेशी |
धरिला वेश तू मानुषी | भक्तजन तारावया ||१०||
तुझी महिमा वर्णावयासी | शक्ती कैंची आम्हासी |
मागेन एक आता तुम्हासी | तें कृपा करणे श्रीसद्गुरुमुर्ती ||११||
माझे वंश पारंपारी | भक्ति द्यावी निर्धारी |
इह सौख्य पुत्रपौत्री | उपरी द्यावी सद्गती ||१२||
ऐसी विनंती करुनी | पुनरपि विनवी करुनावाचनी |
सेवा करितो द्वारयवनी | महाशूर क्रूर असे ||१३||
प्रतिसंवत्सरी ब्राम्हणासी | घात करितो जीवेसी |
यांची करणे आम्हासी | बोलवीतसे मज आजि ||१४||
जाता तयाजवळी आपण | निश्चये घेईल माझा प्राण |
भेटी जाहली तुमचे चरण | मरण कैचे आपणासी ||१५||
संतोषोनी श्रीसद्गुरुमूर्ती | अभयंकर आपुले हाती |
विप्रमस्तकी ठेविती | चिंता न करि म्हणोनिया ||१६||
भय सांडूनी तुवा जावे | क्रूर यवना भेटावे |
संतोषोनी प्रियभावे | पुनरपि पाठवील आम्हापाशी ||१७||
जंववरी तुं परतोनी येसी | असो आम्ही भारावशी |
तुंवा आलीय संतोषी | जाऊ आम्ही येथोनी ||१८||
निजभक्त आमुचा तू होशी | पारंपार वंशोवंशी |
अखिलाभीष्ट तू पावसी | वाढेल संतती तुझी बहुत ||१९||
तुझें वंश पारंपारी | सुखे नांदती पुत्रपौत्री |
अखंड लक्ष्मी तया घरी | निरोगी होती शतायुषी ||२०||
ऐसा वर लाधोन | निघे सायंदेव ब्राम्हण |
जेथे होता तो यवन | गेला त्वरित तया जवळी ||२१||
कालांतक यम जैसा | यवन दृष्ट परियेसा |
ब्राम्हणते पाहता कैंचा | ज्वालारूप होता जाहला ||२२||
विमुख होवुनी गृहांत | गेला यवन कोपत |
विप्र जाहला भय चकित | मनीं श्रीसद्गुरुसी ध्यातसे ||२३||
कोप आलीय ओळबयसि | केंवी स्पर्शे अग्नीसी |
श्रीसद्गुरुकृपा होय ज्यासी | काय करिल क्रूरद्रुष्ट ||२४||
गरुडाचिया पिलीयांसी | सर्प तो कवणे परि ग्रासी |
तैंसे तया ब्राम्हणासी | असे कृपा श्रीसदगुरुंची ||२५||
का एखादे सिंहासी | ऐरावत केंवी ग्रासी |
श्रीसद्गुरुकृपा होय ज्यांसी | काय करिल क्रूरद्रुष्ट ||२६||
ज्यांचे हृदयी श्रीसद्गुरु स्मरण | त्यासी कैचे भय दारूण|
काळमृत्यू न बाधे जाण | अपमृत्यू कायकरी ||२७||
ज्यासी नाही मृत्यूचे भय | त्यासी यवन असे तो काय |
श्रीसद्गुरू कृपा ज्यासी होय | यमाचे मुख्य भय नाही ||२८||
ऐसेपरि तो यवन | अंतः पुरात जाऊन |
सुषुप्ती केली भ्रमित होऊन | शरीर स्मरण त्यासी नाही ||२९||
हृदय ज्वाळा होय त्यासी | जागृत होऊनी परियेसी |
प्राणांतक व्यथेसी | कष्ठतसे तये वेळी ||३०||
स्मरण असे नसे एकही | म्हणे शस्त्रे मारितो घाई |
छेदन करितो अवेव पाही | विप्र एक आपणासी ||३१||
स्मरण जाहले तये वेळी | धावांत गेला ब्रह्मणा जवळी |
लोळतसे चरण कामळी | म्हणे स्वामी तूची माझा ||३२||
येंथे पाचारिले कवनी | जावे त्वरित परतोनी |
वस्त्रे भूषणे देवोनी | निरोप देतो तये वेळी ||३३||
संतोषोनी व्दिजावर | आला ग्राम वेगवक्त्र |
गंगातिरी असे वासर | श्रीसादागुरुचे चरण दर्शना ||३४||
देखोनिया श्रीसदगुरुसी | नमन करितो भावेसी |
स्तोत्र करी बहुवसी | सांगे वृतांत आद्यंत ||३५||
संतोषोनी श्रीसद्गुरुमूर्ती | तया व्दिजा आश्वासिती |
दक्षिण देश जाऊ म्हणती | स्थान स्थान तीर्थयात्रे ||३६||
ऐकोनी श्रीसद्गुरुंचे वचन | विनवितसे कर जोडून |
न विसंबे आता तुमचे चरण | आपण येईन समागमे ||३७||
तुमचे चरणेविन देखा | राहो न शके क्षण एका |
संसार सागर तारका | तूच देवा कृपासिंधू ||३८||
उद्धरावया सगरांसी | गंगा आणिली भूमीसा |
तैसें स्वामी आम्हासी | दर्शन दिधले आपुले ||३९||
भक्त वत्सल तुझी ख्याती | आम्हां सोडणे काय नीती |
सवे येऊ निशिती | म्हणोनी चरणी लागला ||४०||
येणेपरी श्रीसद्गुरुंसी | विनवी विप्र भावेसी |
संतोषोनी विनयेसी | श्रीसद्गुरु म्हणती तये वेळी ||४१||
कारण असे आम्हा जाणे | तीर्थे असती दक्षिणे |
पुनापिः तुम्हा दर्शन देणे | संवत्सरी पंचदशी ||४२||
आम्ही तुमचे गाव समीपत | वास करू हे निश्चित |
कलत्र पुत्र इष्ट भ्रात | मिळोनी भेट तुम्ही आम्हां ||४३||
न करा चिंता असाल सुखे | सकाळ अरिष्टे गेली दुखेः |
म्हणोनी हस्त ठेविती मस्तके | भाक देती तये वेळी ||४४||
ऐसे परि संतोषोनी | श्रीसद्गुरु निघाले तेथोनी |
जेथें असे आरोग्य भवानी | वैजनाथ महाक्षेत्र ||४५||
समस्त शिष्यां समवेत | श्रीसद्गुरु आले तीर्थे पाहत |
प्रखात असे वैजनाथ | तेथे राहिले गुप्त रुपें ||४६||
नामधारक विनवी सिद्धासी | काय कारण गुप्त व्हावयासी |
होते शिष्य बहुवसी | त्यांसी कोठे ठेविलें ||४७||
गंगाधराचा नंदनु | सांगे श्रीसाद्गुरुचारित्र कामधेनु |
सिद्धमुनी विस्तारून | सांगे नामकरणीस ||४८||
पुढील कथेचा विस्तारू | सांगता विचित्र अपरू |
मन करुनी एकाग्रु | एका श्रोत्रे सकळीक हो ||४९||
इति श्रीसद्गुरुचरीत्रामृते परमकथा कल्पतारौ श्रीनृसिंहसरस्वत्युपाख्याने सिद्ध-नामधारक संवादे क्रूरयवन शासनं सायंदेव वरप्रदानं नाम चातुर्दशो अध्यायः ||१४||
|| श्रीसद्गुरुदत्तात्रेयपर्णमस्तु || || श्रीसद्गुरुदेवदत्त ||







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